Pandit Purshotam Gaur https://www.panditpurshotamgaur.com Sat, 29 Jun 2019 09:57:16 +0000 en-US hourly 1 https://wordpress.org/?v=5.2.20 12 राशियों का परिचय एवं उनका स्वभाव https://www.panditpurshotamgaur.com/12-zodiac-sign-and-nature/ Sat, 29 Jun 2019 09:23:05 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1235 ज्योतिष शास्त्र में सबसे ज्यादा महत्व राशियों और ग्रहों को दिया गया है| ज्योतिष में आकाश मंडल को 12 बराबर भागों में बांटा गया है और हर १ भाग एक निश्चित आकृति बनाता है| प्रत्येक आकृति 1 विशिष्ठ राशि का नेतृत्व करती है| प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार हर राशि का 1 स्वामी ग्रह होता …

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ज्योतिष शास्त्र में सबसे ज्यादा महत्व राशियों और ग्रहों को दिया गया है| ज्योतिष में आकाश मंडल को 12 बराबर भागों में बांटा गया है और हर १ भाग एक निश्चित आकृति बनाता है| प्रत्येक आकृति 1 विशिष्ठ राशि का नेतृत्व करती है| प्राचीन ज्योतिष ग्रंथों के अनुसार हर राशि का 1 स्वामी ग्रह होता है| आइये जानते है की कौनसी राशि का स्वामी ग्रह कौन सा है और उस राशि का स्वभाव कैसा है|

१२ राशियाँ:

मेष- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (चू, चे, चो, ला, ली, लू, ले, लो, आ) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब मेष राशि के जातक होते हैं| मेष राशि का स्वामी मंगल है और इसकी आकृति मेंढे के सामान है|  मेष राशि अग्नि तत्व राशि है और इसका स्वभाव चर राशि का है| इस राशि के लोग काफी चंचल और मस्तमौला किस्म के होते है| मेष राशि के इंसान ज्यादतर क्रोधी स्वाभाव के होते है और ज्यादातर मेष राशि के लोग आलसी होते है|

वृष- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (ई, ऊ, ए, ओ, वा, वी, वू, वे, वो) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब वृष राशि के जातक होते हैं| वृष राशि का स्वामी शुक्र है और इसकी आकृति वृष अर्थात बैल के समान है|  वृष राशि पृथ्वी तत्व राशि है और इसका स्वभाव स्थिर राशि का है| वृष राशि के लोग सौंदर्य प्रिय होते है| वृष राशि के जातक ऐशो-आराम पसंद करते है और आमतौर पर इन्हें काफी व्यावहारिक देखा गया है| 

मिथुन- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (का, की, कू, घ, ङ, छ, के, को, ह) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब मिथुन राशि के जातक होते हैं| मिथुन राशि का स्वामी बुध है और इसकी आकृति जुड़वां मनुष्यों के समान है|  मिथुन राशि वायु तत्व राशि है और इसका स्वभाव द्विस्वभाव राशि का है| मिथुन राशि के जातक मिलनसार स्वभाव के होते है और समाज में घुल मिल कर रहना इन्हे पसंद होता है| पाठन और पठन के कार्य में भी ये लोग दक्ष माने जाते है|

कर्क- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (ही, हू, हे, हो, डा, डी, डू, डे, डो) से जिन जातकों नाम शुरू होता है वो सब कर्क राशि के जातक होते हैं| कर्क राशि का स्वामी चन्द्रमा है और इसकी आकृति केकड़े के समान है| कर्क राशि जल तत्व राशि है और इसका स्वाभाव चर राशि का है| कर्क राशि के जातक भावनात्मक रूप से बहुत ज्यादा संवेदनशील होते है| इनकी याददाश्त भी गज़ब की होती है| इन्हे परिवार जन और मित्रों से घिरा हुआ होना पसंद होता है|

सिंह- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (मा, मी, मू, मे, मो, टा, टी, टू, टे) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब सिंह राशि के जातक होते हैं| सिंह राशि का स्वामी सूर्य है और इसकी आकृति शेर के समान है| सिंह राशि  अग्नि तत्व राशि है और इसका स्वाभाव स्थिर राशि का है| सिंह राशि के जातकों में नेतृत्व करने की में क्षमता नैसर्गिक रूप से पायी जाती है| अमूमन सिंह राशि के जातक थोड़े क्रोधी स्वभाव के होते है किन्तु ये बहुत महत्वाकांक्षी भी होते है| साहसी होने के साथ ही इनकी निर्णय क्षमता भी गज़ब की होती है| 

कन्या- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (ढो, पा, पी, पू, ष, ण, ठ, पे, पो) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब कन्या राशि के जातक होते हैं| कन्या राशि का स्वामी बुध है और इसकी आकृति खड़ी कन्या के समान है| कन्या राशि पृथ्वी तत्व राशि है और इसका स्वाभाव द्विस्वभाव राशि का है| कन्या राशि के जातक में एक अच्छे प्रबंधक के गुण मौजूद होते है| वाणी में ओज और आकर्षक व्यक्तित्व इस राशि के जातकों  ख़ास पहचान होती है|

तुला- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (रा, री, रू, रे, रो, ता, ती, तू, ते) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब तुला राशि के जातक होते हैं| तुला राशि का स्वामी शुक्र है और इसकी आकृति तराजू के समान है| तुला राशि वायु तत्व राशि है और इसका स्वाभाव चर राशि का है| तुला राशि के जातक शुक्र ग्रह से प्रभावित होते है, शुक्र जो की भोग और विलास का कारक ग्रह होता है उस से प्रभावित व्यक्ति भोगी और विलासी प्रवृति का होता है| जीवन में सांसारिक सुखों की तरफ इनका विशेष झुकाव होता है| चूँकि तुला का अर्थ तराज़ू होता है इस राशि के जातक हिसाब-किताब के माहिर होते है और जीवन के हर पहलु में समन्वय बना कर चलना पसंद करते है| 

वृश्चिक- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (ना, नी, नु, ने, नो, या,यी,यु) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब वृश्चिक राशि के जातक होते हैं| वृश्चिक राशि का स्वामी मंगल है और इसकी आकृति बिच्छू के समान है| वृश्चिक राशि जल तत्व राशि है| वृश्चिक राशि के जातक मंगल ग्रह से प्रभावित होते है, मंगल से प्रभावित होने की वजह से वृश्चिक राशि के जातक कर्मठ, झुझारू किस्म के होते है| आमतौर पर वृश्चिक राशि के जातकों में साहसी प्रवृति देखी गयी है| किसी भी कार्य को शुरू करने के बाद उस कार्य को समाप्त कर के ही दम लेते है| इस राशि के व्यक्ति बिच्छू के समान डंक मारने वाले होते है और वैर भाव होने पर अपनी बारी का इंतज़ार करते है और बदला ले कर ही दम लेते है| 

धनु- हिंदी वर्णमाला के अक्षर ( य, यो, भा, भि, भू, ध, फा, ढ, भे ) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब धनु राशि के जातक होते हैं| धनु राशि का स्वामी बृहस्पति है  और इसकी आकृति आधे अश्व और आधे धनुर्धारी पुरुष के समान है| धनु राशि अग्नि तत्व राशि है| धनु राशि के जातक बृहस्पति ग्रह से प्रभावित होते है, बृहस्पति से प्रभावित होने की वजह से धनु राशि के जातक धार्मिक, बुद्धिमान, और वाक्पटु किस्म के होते है| धनु राशि से प्रभावित व्यक्ति अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित होते है और लक्ष्य भेदन के लिए साम, दाम, दंड और भेद आदि सभी नीतियों का प्रयोग करने में गुरेज़ नहीं करते है| सफलता के प्रति आसक्त होना इन्हे घातक बना देता है| आमतौर इन्हे विश्वस्त मित्र माना जाता है| देव गुरु बृहस्पति से संचालित होने से धनु राशि के जातक समाज में प्रतिष्ठित, धनी और सुखी होते है| 

मकर- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (भो, जा, जी, खी, खू, खे, खो, गा, गी) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब मकर राशि के जातक होते हैं| मकर राशि का स्वामी शनि है  और इसकी आकृति मगरमच्छ के समान है| मकर राशि पृथ्वी तत्व राशि है| मकर राशि के जातक शनि ग्रह से प्रभावित होते है, शनि से प्रभावित होने की वजह से मकर राशि के जातक साहित्य के प्रेमी होते है खासकर कुम्भ राशि की स्त्रियां बहुत सुन्दर और गुणी होतीं हैं | 

कुम्भ- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (गू, गे, गो, सा, सी, सू, से, सो, दा) से जिन जातकों  का नाम शुरू होता है वो सब कुम्भ राशि के जातक होते हैं| कुम्भ राशि का स्वामी शनि है  और इसकी आकृति घड़े के समान है| कुम्भ राशि वायु तत्व राशि है| कुम्भ राशि के जातक शनि ग्रह से प्रभावित होते है, शनि से प्रभावित होने की वजह से कुम्भ राशि के जातक परोपकारी और मानवीय गुणों से ओतप्रोत होते हैं| इस राशि के जातक ज्यादतर कलाप्रेमी होते है, गूढ़ विद्याओं के जानकार होते है|

मीन- हिंदी वर्णमाला के अक्षर (दी, दू, थ, झ, ञ, दे, दो, चा, ची) से जिन जातकों का नाम शुरू होता है वो सब मीन राशि के जातक होते हैं| मीन राशि का स्वामी बृहस्पति है और इसकी आकृति २ मछलियों के समान है| मीन राशि जल तत्व राशि है| मीन राशि के जातक  बृहस्पति ग्रह से प्रभावित होते है, बृहस्पति से प्रभावित होने की वजह से मीन राशि के जातक धार्मिक प्रवृति के होते है| लेखन, पठन और शिक्षा के क्षेत्र में परचम लहराते हैं|

श्री राम जय राम जय जय राम 

मेरे राम की जय हो

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निर्जला एकादशी व्रत का पौराणिक महत्व, कथा एवं पूजन विधि https://www.panditpurshotamgaur.com/nirjala-ekadashi-vrat-katha-evam-poojan-vidhi/ Wed, 12 Jun 2019 12:16:35 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1227 एकादशी व्रत हिन्दू धर्म के अनुसार बहुत ही शुभ व्रत माना जाता है। एकादशी एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ‘ग्यारह’। प्रत्येक माह में दो एकादशी तिथि होती है, जो कि एक शुक्ल पक्ष एवं एक कृष्ण पक्ष के दौरान आती हैं।ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी के रूप …

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एकादशी व्रत हिन्दू धर्म के अनुसार बहुत ही शुभ व्रत माना जाता है। एकादशी एक संस्कृत शब्द है जिसका अर्थ है ‘ग्यारह’। प्रत्येक माह में दो एकादशी तिथि होती है, जो कि एक शुक्ल पक्ष एवं एक कृष्ण पक्ष के दौरान आती हैं।ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी तिथि को निर्जला एकादशी के रूप में मनाया जाता है।

निर्जला एकादशी को पूरे साल की 24 एकादशियों में सबसे श्रेष्ठ एकादशी माना जाता है। इस एकादशी का व्रत करने से सभी 24 एकादशियों के समान फल मिलता है। निर्जला, यानी बिना पानी के उपवास रहने के कारण इसे निर्जला एकादशी कहा जाता है। उपवास के कठोर नियम होने के कारण सभी एकादशी व्रतों में निर्जला एकादशी व्रत सबसे कठिन होता है। इस एकादशी के दिन उपवास करने से व्यक्ति को दीर्घायु, सुख समृद्धि तथा मोक्ष की प्राप्ति होती है।

निर्जला एकादशी व्रत कथा

 

निर्जला एकादशी व्रत की पौराणिक कथा पांडवों से सम्बंधित है इसलिए ‘पाण्डव एकादशी’ और ‘भीमसेन एकादशी’ के नाम से भी जाना जाता है। एक दिन महर्षि व्यास ने पांडवों को एकादशी के व्रत का विधान तथा फल का वर्णन कर रहे थे। भीम के अलावा अन्य पांडव एकादशी के व्रत को करने में सहज थे किन्तु भीम खाने-पीने के अत्यधिक शौक़ीन थे एवं वे अपनी भूख को नियन्त्रित करने में सक्षम नहीं थे।

इस परिस्थिति में भीम ने अपनी आपत्ति प्रकट करते हुए महर्षि व्यास से आग्रह किया, कि प्रभु मैं वर्ष के २४ दिन बिना खाए रह ही नहीं सकता इसलिए आपके आदेश का पालन करने में असमर्थ हूँ कृपया आप मुझे इसका कोई विकल्प बताएं। जिससे मैंने चौबीस एकादशियों पर निराहार रहने की कष्ट साधना से बच सकूँ और वह फल भी मिल जाए जो अन्य लोगों को चौबीस एकादशी व्रत करने पर मिलेगा।

महर्षि व्यास ने भीम के इस प्रकार के भाव को समझते हुए उन्हें आदेश दिया, ”प्रिय भीम! तुम ज्येष्ठ शुक्ल एकादशी को ही एक मात्र निर्जला व्रत किया करो। यह व्रत अन्य २३ एकादशी व्रत के तुल्य है। इस प्रकार यह व्रत करने से अन्य 23 एकादशियों पर अन्न खाने का दोष छूट जाएगा तथा पूर्ण एकादशियों के पुण्य का लाभ भी मिलेगा। क्योंकि भीम ने एक मात्र एकादशी व्रत करने का महर्षि व्यास के आदेश को प्रसन्नतापूर्वक स्वीकार कर लिया, इसलिए इस व्रत को  भीमसेन एकादशी भी कहा जाता है।

निर्जला एकादशी पूजन विधि

 

निर्जला एकादशी के व्रत में जल पान निषिद्ध होने के कारण यह व्रत अत्यधिक श्रम साध्य होने के साथ−साथ संयम साध्य भी है। इस दिन निर्जल व्रत करते हुए शेषशायी रूप में भगवान विष्णु की आराधना का विशेष महत्व है।  इस व्रत को स्त्री और पुरुष दोनों ही कर सकते हैं।

इस दिन सुबह शीघ्र उठकर स्नानादि कार्यों से निवृत्त होकर भगवान विष्‍णु के व्रत का संकल्प लें। भगवान विष्‍णु की आराधना करें और “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय” मंत्र का जाप करें। भगवान विष्णु की पूजा करते समय उन्हें लाल फूलों की माला पहनाये, धूप, दीप, नैवेध, फल अर्पित करके उनकी आरती करते हुए मंगलकामना करें।

धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, निर्जला एकादशी पर व्रत रखने से चंद्रमा द्वारा उत्पन्न हुआ नकारात्मक प्रभाव समाप्त होता है एवं जीवन में सकारात्मक ऊर्जा का संचार होता है।

इस दिन जल कलश के दान का विशेष महत्व है। अपनी सामर्थ्यानुसार जल से भरा मिट्टी का कलश या किसी भी धातु से निर्मित जल कलश का दान अत्यधिक शुभ एवं फलदायी है। इसके साथ ही यथासंभव अन्न, वस्त्र, छतरी, हाथ का पंखा, आम, खरबूजा, तरबूज तथा अन्य मौसम के फल आदि का दान करें। इसके अतिरिक्त राहगीरों के लिए किसी भी सार्वजनिक स्थान पर ठंडे एवं मीठे जल की प्याऊ लगाना अत्यंत फलदायक है और पुण्य में बढ़ोत्तरी करता है ।

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पंचामृत की महिमा और उसको बनाने की विधि https://www.panditpurshotamgaur.com/panchaamrt-ki-mahima-aur-usko-banane-ki-vidhi/ Tue, 23 Apr 2019 13:32:18 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1202 पंचामृत हिन्दू धर्म का अभिन्न हिस्सा है, आदिकाल से ही मंदिरों में या घरों में पूजा-अर्चना करते समय पंचामृत का प्रयोग नियमित रूप से किया जाता रहा है| पंचामृत शब्द “पञ्च” और “अमृत” के युग्म से बना है| मतलब साफ़ है की पंचामृत – पांच अमृत तुल्य चीज़ों के मिश्रण से बनता है| पंचामृत का …

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पंचामृत हिन्दू धर्म का अभिन्न हिस्सा है, आदिकाल से ही मंदिरों में या घरों में पूजा-अर्चना करते समय पंचामृत का प्रयोग नियमित रूप से किया जाता रहा है| पंचामृत शब्द “पञ्च” और “अमृत” के युग्म से बना है| मतलब साफ़ है की पंचामृत – पांच अमृत तुल्य चीज़ों के मिश्रण से बनता है|

पंचामृत का प्रयोग भगवान् विष्णु और शालिग्राम के अभिषेक में किया जाता है, प्राचीन हिन्दू धर्मग्रंथों के अनुसार भगवान् का अभिषेक करने के पश्चात् उसको पीने से मनुष्य के आरोग्य, बल, सौभाग्य, आदि में वृद्धि होती है| पंचामृत का प्रसाद पीने से मोक्ष की प्राप्ति होती है ऐसा भी कई जगह उल्लेख मिलता है|

पंचामृत बनाने की विधि:-

मूलतः पंचामृत बनाने के लिए निम्लिखित चीज़ों की जरुरत होती है|

  1. घृत
  2. मधु
  3. मिश्री
  4. दही
  5. दूध

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घृत- घृत यानी घी| घी को आयुर्वेद में भी बलवर्धक माना गया है| कुछ आयुर्वेद से जुड़े ग्रंथो में तो गौघृत (गाय के दूध से बने हुआ घी) को अमृततुल्य माना है| मानव को घी का सेवन करना अत्यधिक लाभकारी होता है| दूसरी तरफ घृत भारतीय सभ्यता में स्नेह का प्रतीक भी माना गया है, पंचामृत में घी होना उसे स्नेहशील बनाता है|

मधु- मधु यानी शहद| शहद के गुण निर्विवादित रूप से हज़ारों गुणों से युक्त है| गाय के दूध में मिलते ही इसके गुणधर्मों में अप्रत्याशित बढ़ोत्तरी हो जाती है| शहद को बहुत सारी आयुर्वेदिक दवाइयों में काम में लिया जाता है| खासतौर पर सर्दी-खांसी, निर्बलता, आदि बिमारियों में शहद रामबाण की तरह काम करता है| मधु यानी शहद बल का प्रतीक है, पंचामृत में शहद की उपस्तिथि उसे बलशाली बनाता है|

मिश्री- मिश्री/शक्कर/बूरा मीठा होता है और मीठे को मांगलिक माना गया है| मिठास हर्ष, उल्लास, प्रस्सनता का द्योतक है, इसीलिए मिश्री का प्रयोग पंचामृत में मिठास घोलने के लिए प्रयोग करते है|

दही- पंचामृत बनाने में गौमाता के दूध से बने हुए दही का प्रयोग इसके गुणों में वृद्धि करता है| दही को कैल्शियम का सबसे बेहतरीन स्रोत माना गया है, दही के सेवन से हड्डियों में मजबूती आती है और रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ती है|

दूध- दूध के तो इतने गुण है की इसकी व्याख्या कर पाना ही अपने आप में १ दुष्कर कार्य है और यदि दूध गाय का हो तो सोने पर सुहागा| दूध को पवित्रता का प्रतीक माना गया हैबनाता है| यहाँ तक की देव स्नान में भी दूध का ही प्रयोग होता आया है|

panchaamrt

पंचामृत बनाए में कुछ चीज़ों का विशेष ध्यान रखना होता है जैसे की पवित्रता, भाव और सही अनुपात में मिश्रण|

चूँकि पंचामृत भगवान् को चढ़ाया जाता है इसीलिए पंचामृत बनाते समय पवित्रता और स्वच्छता पर विशेष ध्यान देना होता है| गौ माता के दूध और उसी दूध से बना हुआ दही और घी काम में लेना चाहिए, इससे पंचामृत में ईश्वर का निवास होता है क्यूंकि वैदिक संस्कृति में गौमाता के अंदर ३३ कोटि देवी-देवताओं का निवास माना गया है|

पंचामृत बनाते समय ईश्वर के प्रति श्रद्धाभाव का होना बहुत ही जरुरी है| जैसा की हम सब जानते है की भगवान भक्त के भाव के भूखे हैं, तो किसी भी चीज़ को यदि श्रद्धा भाव से बना कर भगवान् के समक्ष प्रस्तुत की जाये तो निश्चित ही कृपा की प्राप्ति होती है|

पंचामृत बनाते समय पांचों चीज़ों घी, शहद, मिश्री, दही और दूध का सही अनुपात में होना जरुरी है|

पंचामृत बनाने का सही अनुपात:

सबसे पहले घी लें, शहद घी से दूगनी मात्रा में होगा, मिश्री शहद से दूगनी मात्रा में होगी, दही मिश्री से दूगनी मात्रा में होगा और दूध दही से दूगनी मात्रा में होगा|

उदहारण के लिए मान लीजिये:

  • घी: १ कटोरी
  • शहद: २ कटोरी
  • मिश्री:४ कटोरी
  • दही: ८ कटोरी
  • दूध: १६ कटोरी

 

पंचामृत से शालिग्राम जी या विष्णु अवतार के विग्रह को स्नान कराने के बाद तुलसीदल मिला कर प्रसाद के रूप में पीना चाहिए और बाकी बचा हुआ भक्तों में बाँट देना चाहिए| पंचामृत से भगवान का अभिषेक करने से जीवन की सारी समस्याओं का अंत होता है और मानव परम-पद मोक्ष की तरफ अग्रसर होता हैबनाता है|

 

श्री राम जय राम जय जय राम

मेरे राम की जय हो

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हनुमान जन्म कथा और उनके विवाह का रहस्य https://www.panditpurshotamgaur.com/hanuman-janmotsav-par-kya-karen/ Fri, 19 Apr 2019 07:28:00 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1182 हनुमान जन्मोत्सव चैत्र मास में पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है| वैसे तो हनुमान जन्मोत्सव हमेशा ही भक्तों के लिए कल्याणकारी होता है, पर इस २०१९ में हनुमान जन्मोत्सव २ शुभ संयोग के साथ आया है, इस बार गजकेसरी योग और चित्रा नक्षत्र का शुभ योग बना है| इस दिन हनुमान जी का पूजन करने …

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हनुमान जन्मोत्सव चैत्र मास में पूर्णिमा तिथि को मनाया जाता है| वैसे तो हनुमान जन्मोत्सव हमेशा ही भक्तों के लिए कल्याणकारी होता है, पर इस २०१९ में हनुमान जन्मोत्सव २ शुभ संयोग के साथ आया है, इस बार गजकेसरी योग और चित्रा नक्षत्र का शुभ योग बना है| इस दिन हनुमान जी का पूजन करने से सभी मनोकामनाएं पूरी होती है|


हनुमान जयंती या हनुमान जन्मोत्सव?


पौराणिक मान्यताओं के अनुसार हनुमान जी चिरंजीवी है और पृथ्वी पर ही है| कलियुग में हनुमान जी ही पृथ्वी लोक में सारी शक्तियों के सूत्रधार है| अब प्रश्न ये है की जब हनुमान जी पृथ्वी पर ही है तो उनकी जयंती कैसे मनाई जा सकती है क्यूंकि जयंती तो उनकी ही मनाई जाती है जो पृथ्वी छोड़ चुके है| इसीलिए हनुमान जयंती शब्द का प्रयोग अनुचित है, इसकी जगह हमें हनुमान जन्मोत्सव मनाना चाहिए|


हनुमान जन्म कथा:


प्राचीन धर्म ग्रंथों के अनुसार समुद्रमंथन में हलाहल विषपान के पश्चात महादेव ने मोहिनी अवतार के दर्शन किये इस से उन्हें वीर्यपात हुआ और पवन देव ने उस अंश को वानरराज केसरी की पत्नी अंजना जो की वास्तव में १ शापित अप्सरा थीं के गर्भ में स्थापित किया|
भगवान् शिव के अंश की वजह से ये ११वें रूद्र अवतार हुए और पवन देव की वजह से इन्हे पवनपुत्र भी कहा जाता है|

hanumaan janm katha


हनुमान जी के विवाह का रहस्य


हनुमान जी तो ब्रह्मचारी है ये बात सर्वविदित है और शत-प्रतिशत सच भी है| किन्तु हनुमान जी विवाहित है ये बात बहुत ही गूढ़ है और अधिकांश लोगों को इस बारे में कुछ नहीं पता|

पराशर संहिंता में भी इस बात का विवरण है|
हनुमान जी विवाहित है, इनकी पत्नी का नाम सुर्वंचला है जो की सूर्य देव की पुत्री है|
जब हनुमान जी अपने गुरु सूर्य से शिक्षा ग्रहण कर रहे थे, सूर्यदेव ने हनुमान जी को ५  विद्याएं सीखा दी पर बाकी की ४ विद्या सीखने के लिए हनुमान जी का विवाहित होना जरुरी था|

हनुमान जी को महातेजस्वी जान कर सूर्यदेव ने खुद की पुत्री सुर्वंचला का विवाह प्रस्ताव हनुमान जी के समक्ष रखा| इस पर हनुमान जी ने कहा की वो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करेंगे तो विवाह कैसे संभव है उनके लिए|

सूर्यदेव ने हनुमान जी की शंका का समाधान करते हुए कहा की उनकी पुत्री सदैव तपस्या में लीन रहती है और विवाह के पश्चात् भी वो तुरंत हमेशा के लिए तपस्या में लीन हो जाएगी|
यह बात सुनकर हनुमान जी विवाह के लिए मान गए|

इस युक्ति से हनुमान जी का विवाह भी हो गया और ब्रह्मचर्य व्रत भी अखंड रहा|


hanumaan jee ke vivaah ka rahasy


हनुमान जी का सपत्नीक मंदिर

भारत के तेलंगाना राज्य में खम्मम में हनुमान जी का सपत्नीक मंदिर है, विश्वभर से यहाँ लोग इस विचित्र किन्तु चमत्कारिक मंदिर में दर्शन करने आते है| मान्यता है की इस मंदिर में दर्शन करने से वैवाहिक समस्याओं का समाधान होता है और पति-पत्नी के बीच प्रेम बढ़ता है|

hanumaan jee ka sapatneek mandir


हनुमान जन्मोत्सव पर क्या करें?


इस दिन हनुमान जी का वैदिक पद्दति से पूजन करना विशेष लाभ देता है| वैसे तो हनुमान जी स्मरण करने मात्र से ही सभी कष्टों को हर लेते है पर राम नाम का स्मरण उन्हें विशेष प्रेरणा देता है|

हनुमान जन्मोत्सव को ये करें:

हनुमान मंदिर में जाएं और बजरंगबली के दर्शन करें|
राम नाम संकीर्तन करें| जहाँ पर राम नाम संकीर्तन होता है वहां पर हनुमान जी महाराज जरूर उपस्थित रहते है ऐसा उनका वचन है|

हनुमान चालीसा, सुंदरकांड, रामचरितमानस का पाठ करना चाहिए|
हनुमान यज्ञ करने से सारी बाधाओं
से बंधन मुक्त हो जाते है और मनुष्य सुखमय जीवन की ओर अग्रसर होता है|
हनुमान जी को सिंदूर और चमेली के तेल का चोला चढ़ाएं|
उनको वानर रूप के कारण फल अतिप्रिय हैं, फलों में भी केला, अमरुद, अंगूर ख़ास पसंद है| ये फल हनुमान जी को अर्पण करें|
वस्त्र के रूप में हनुमान जी को लाल लंगोट अर्पण करनी चाहिए|
हनुमतप्रकाश मंत्र का जाप करना चाहिए|
यह ब्रह्मचारी हनुमाजी का दिन है तो ब्रह्मचर्य व्रत का पालन करें और मर्यादित व्यवहार करें|
मांस, अंडा, मछली, शराब आदि का प्रयोग पूर्णतः वर्जित है|
भगवान् राम के अनन्य भक्त हनुमान जी को रिझाने के लिए सबसे आसान रास्ता है भगवान् राम का स्मरण और उनके सिद्धांतों का जीवन में अनुसरण करना|



महावीर हनुमान जी की कृपा आप पर बनी रहे|
हनुमान जन्मोत्सव की हार्दिक शुभेच्छा|

श्री राम जय राम जय जय राम
मेरे राम की जय हो



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How To Use Mantra For Healing https://www.panditpurshotamgaur.com/how-to-use-mantra-for-healing/ Mon, 15 Apr 2019 08:35:03 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1165 The lives have become busier than ever. Everyone is busy chasing the future goals and dreams to be achieved. But has anyone stopped and reflected back for a second? What you have been doing? For what you have been running? What goals will you achieve? Is it all worth it? These are some of the …

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The lives have become busier than ever. Everyone is busy chasing the future goals and dreams to be achieved. But has anyone stopped and reflected back for a second?

What you have been doing? For what you have been running? What goals will you achieve? Is it all worth it? These are some of the questions, you should ask yourself once in a while.

Having a goal and running after it is good. But pausing and rejuvenating yourself is equally important. The level of stress and depression is increasing day by day.

Every second person is being held in the shackles of stress and depression. In this fast-moving and demanding life, you need to find a way to revitalize your energy.

The human body consist of Air, Water, Fire, Earth and Space. Each of these elements have a special role, both in the human body and the surrounding atmosphere. And it is this role that forms a connection for the transformation of energy between both body and atmosphere.

Now, one of the best ways to heal yourself of this everyday stress is – Mantra. The chanting of mantras has scientifically proven to have positive effects on the body. The mantra power is a very effective way to heal any type of stress or problem.

The best thing about mantra therapy is, its effect is not just limited to the physical body. It also extends its healing power to the materialistic, psychological and spiritual world.

Talking from the physical point of view

According to science, it has been proven that, chanting mantras and the energy emitting from the sound has a healing effect on the body.

The best example of this can be the results seen from the chanting of the mantra ‘OM’. It is proven that frequent chanting of ‘OM’, produces some vibrations. And these vibrations activate the chakras present in the body.

Om

Talking from the spiritual point of view

It is believed that regular mantra chanting with dedication and devotion, brings you closer to God.

This can be very well explained from this Sanskrit shloka –  “देवाधीनं जगत्सर्वं, मंत्राधीनं देवता”. The literal meaning of the shloka is – the world is in pursuance with the Gods/Devtas and the devas are in pursuance with the mantras.

Well, this clearly defines it. If you want to be closer to God, one way is to chant mantras.

Mantra Healing

Talking from the psychological point of view

mantras have a significant effect, physically. And undoubtedly, it also shows its powers psychologically. It has been seen in several cases where mantras have had a healing impact psychologically.

The sound has a unique quality of transmitting both positive as well as negative energy. A soothing sound or the sound of a mantra gives a relaxing feeling and calms all your senses. This relaxation and calmness along with physical healing give you psychological peace as well.

mantra healing

Talking from the materialistic point of view

Everything in this world which is born, will one day be destroyed. This is a universal truth. While there is life, there is a relation between each alive component on this earth.

Each element has a way of passing on energy from one component to the other. In this materialistic world, our body consists of five elements. And by chanting mantras, each of these elements passes energy to each other.

Chanting mantras can be the best healing therapy. Nowadays even the doctors recommend this, especially to patients dealing with depression and anxiety. In fact, many therapy homes have been opened, to give this type of treatment.

Mantra Healing- physical

Things to keep in mind while chanting mantras –

  • Create your own special place to chant
  • Light your favorite incense or candle
  • Put a picture or figurine or any solid form that inspires you
  • Fix a daily routine and be consistent in following it
  • Relax your mind and body before starting to chant
  • Start with a prayer or by showing gratitude to the deity you believe in
  • Make sure you are sitting in the right posture
  • You can use beads to keep a count of the number of times you chanted the mantra.
  • The correct pronunciation of the mantra is very important
  • Sitting and facing the right direction is also important. Try to sit in a direction where you are facing the north.
mantra healing

Mantra chanting can be a really great healing therapy. Not only it makes you strong spiritually, but scientifically also it has proven to be good for the body and mind. But another thing that is also very important about mantra chanting is having an apt knowledge about it.

Get the mantra from a learned astrologer or a guru, who can give you the best knowledge about it and also tell you its correct pronunciation.

Try the mantra healing therapy and experience the changes for yourself. Do share your experiences or thoughts about how to use mantra for healing in the comment box.

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माँ दुर्गा का नौवां स्वरुप – सिद्धिदात्री https://www.panditpurshotamgaur.com/maa-durga-ka-nauwa-swaroop/ Sat, 13 Apr 2019 11:13:01 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1162 नवरात्री का नौवां दिन दुर्गा माँ के सिद्धिदात्री स्वरुप को समर्पित है, जैसा की माँ के नाम से ही अनुमान हो जाता है की माँ सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं| नौ दिन तक देवी माँ की भक्ति में लीन रहने के बाद नौवें दिन मातारानी अपने भक्तों को सभी सिद्धियों को आशीर्वाद …

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नवरात्री का नौवां दिन दुर्गा माँ के सिद्धिदात्री स्वरुप को समर्पित है, जैसा की माँ के नाम से ही अनुमान हो जाता है की माँ सिद्धिदात्री सभी सिद्धियों को प्रदान करने वाली हैं| नौ दिन तक देवी माँ की भक्ति में लीन रहने के बाद नौवें दिन मातारानी अपने भक्तों को सभी सिद्धियों को आशीर्वाद स्वरुप देतीं हैं|

माँ सिद्धिदात्री का वाहन सिंह हैं और देवी माँ कमल के आसन पर विराजमान हैं, इनके ४ हाथ हैं जिनमें गदा, शंख, चक्र और कमल का पुष्प हैं|

माँ सिद्धिदात्री को सभी देवों ने अपनी-अपनी सिद्धियां प्रदान की थी, इस सृष्टि में ऐसी कोई सिद्धि नहीं हैं जिस पर इनका अधिकार नहीं हो| ऐसे में साधकों के लिए माँ सिद्धिदात्री का पूजन बहुत जरुरी हैं|

माँ सिद्धिदात्री का पूजन वैदिक पद्दति से करना चाहिए और अगर ये संभव नहीं हो तो सच्ची श्रद्धा भाव से साधारण पूजा भी मनोकामना पूरी करती हैं| माँ को लाल रंग बहुत प्रिय हैं इसीलिए विशेष कृपा के लिए मातारानी को लाल रंग के फूल जरूर चढाने चाहिए| लाल रंग का नया जोड़ा अर्पण कर के शरणागत भाव से माँ का ध्यान करना चाहिए|

माँ सिद्धिदात्री  के पूजन के साथ ही नवरात्री व्रत भी खोल लेना चाहिए, निर्धन बालिकाओं की सेवा करने से देवी दुर्गा के सभी स्वरुप अत्यधिक हर्ष का अनुभव करतें हैं और भक्त का जीवन खुशियों से भर देते हैं|

माँ सिद्धिदात्री  का मंत्र:

सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि |
सेव्यमाना सदा भूयात् सिद्धिदा सिद्धिदायिनी ||

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माँ दुर्गा का आठवाँ स्वरुप – महागौरी https://www.panditpurshotamgaur.com/maa-durga-ka-athawa-swaroop/ Sat, 13 Apr 2019 08:42:56 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1158 नवरात्री पर्व का आठवां दिन सबसे महत्वपूर्ण है, नवरात्री अष्टमी को दुर्गा अष्टमी भी कहा जाता है| इस दिन की जाने वाली आराधना माँ भगवती जरूर सुनती है| नवरात्र अष्टमी माँ दुर्गा के महागौरी स्वरुप को समर्पित है| माँ महागौरी के ४ हाथ है जिनमें क्रमशः त्रिशूल, डमरू, अभयमुद्रा और वरमुद्रा है| महागौरी का वाहन …

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नवरात्री पर्व का आठवां दिन सबसे महत्वपूर्ण है, नवरात्री अष्टमी को दुर्गा अष्टमी भी कहा जाता है| इस दिन की जाने वाली आराधना माँ भगवती जरूर सुनती है| नवरात्र अष्टमी माँ दुर्गा के महागौरी स्वरुप को समर्पित है|

माँ महागौरी के ४ हाथ है जिनमें क्रमशः त्रिशूल, डमरू, अभयमुद्रा और वरमुद्रा है| महागौरी का वाहन वृषभ है, महागौरी का वर्ण गौर है और इसी वजह से इन्हे महागौरी का नाम मिला|  

पौराणिक कथाओं के अनुसार देवी पार्वती ने महादेव को पति रूप में पाने के लिए कठोर तप किया, जब महादेव ने उनके तप से खुश होकर उन्हें वरदान देने पहुंचे तो पाया की माँ पार्वती का रंग कठोर तप के कारण एकदम काला पड़ गया, ये देख कर शिव जी ने माँ पार्वती को गंगा जल से स्नान कराया| गंगाजल के स्पर्श से ही माँ पार्वती का रंग धवल हो गया और उन्हें महागौरी का रूप मिला|

अष्टमी के दिन नवरात्री साधना के पूरे होने का दिन भी होता है, चूँकि माँ पार्वती की साधना पूरी होने पर उन्हें महागौरी का स्वरुप मिला इसीलिए साधकों के लिए आज महागौरी को पूजने का दिन है जो की साधना के पूरी होने की द्योतक है|

माँ महागौरी का पूजन पंचोपचार से करना चाहिए और देवी माँ को चुनरी, सौभग्य सामग्री आदि अर्पित करनी चाहिए| इस दिन कन्या पूजन का विशेष महत्व है, छोटी बच्चियों को हलवा-पूरी आदि परोसने के बाद चरण पूजन करना चाहिए और भली भाँती दक्षिणा आदि दे कर आशीर्वाद लेना चाहिए|

माँ महागौरी का मंत्र:

श्वेते वृषे समारुढा श्वेताम्बरधरा शुचिः |
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ||


श्री राम जय राम जय जय राम
मेरे राम की जय

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माँ दुर्गा का सातवाँ स्वरुप – कालरात्रि https://www.panditpurshotamgaur.com/maa-durga-ka-satwa-swaroop/ Fri, 12 Apr 2019 13:26:44 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1153 नवरात्री के महापर्व की सप्तमी या सातवां दिन दुर्गा माँ के कालरात्रि स्वरुप को समर्पित है| माँ कालरात्रि को काली, चामुंडा, रुद्राणी, चंडी आदि नामों से भी जाना जाता है| माँ कालरात्रि का स्वरुप दिखने में बहुत ही भयानक है, दुष्ट इनके स्मरण मात्र से ही भयाक्रांत हो जाते है किन्तु भक्तों और सज्जनों के …

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नवरात्री के महापर्व की सप्तमी या सातवां दिन दुर्गा माँ के कालरात्रि स्वरुप को समर्पित है| माँ कालरात्रि को काली, चामुंडा, रुद्राणी, चंडी आदि नामों से भी जाना जाता है|

माँ कालरात्रि का स्वरुप दिखने में बहुत ही भयानक है, दुष्ट इनके स्मरण मात्र से ही भयाक्रांत हो जाते है किन्तु भक्तों और सज्जनों के लिए ये ही स्वरुप कल्याण का मार्ग प्रशस्त करते है| नवरात्री के सातवें दिन तांत्रिक सिद्धियों को प्राप्त करने और अनुसरण करने का दिन होता है|

सातवां स्वरुप: माँ कालरात्रि

माँ कालरात्रि का रंग एकदम काला है, इनके ४ हाथ है जिनमें क्रमशः खड़ग, खप्पर, रक्तपात्र और राक्षस की कटी हुई गर्दन है| इनकी सवारी गदर्भ है, माँ कालरात्रि का एक नाम शुभंकरी भी है क्यूंकि इनके आते ही सृष्टि की समस्त अशुभ शक्तियां गायब हो जाती है|

नवरात्र सप्तमी तांत्रिक क्रियाओं के लिए भी बहुत लाभकारी है, इस दिन किए जाने वाली तांत्रिक क्रियाएं जरूर सिद्ध होती है और साधक को दिव्य सिद्धि की तरफ ले जाती है|

नियति जनित ऐसी कोई समस्या नहीं है जिसे मानव माँ कालरात्रि के आशीर्वाद से समाधान नहीं कर सकता हो|

पौराणिक कथाओं के अनुसार रक्तबीज नाम का दैत्य जो की बहुत बलशाली था, उससे वरदान था की जहाँ उसके रक्त की १ बूँद गिरेगी वहीँ से १ और रक्तबीज खड़ा हो जायेगा, तब भगवान् महाकाल और देवी दुर्गा के क्रोध से महाकाली स्वरुप का निर्माण हुआ| माँ काली ने रक्तबीज का वध करके उसके रक्त की १ भी बूँद नहीं गिरने दी और सारा रक्त खुद पी गयी| इसी के साथ सृष्टि में रक्तबीज के आतंक खत्म हुआ और दैविक शक्तियों ने वापस सृष्टि में धर्म की स्थापना की|

माँ दुर्गा का ये रूप देखने में बहुत ही भयानक है किन्तु धर्म का पालन करने वालों के लिए परम सुखदायी और ममतामयी वात्स्ल्य से परिपूर्ण है|

सप्तमी के दिन शुद्ध चित्त और शरणागत भाव के साथ माँ कालरात्रि का पूजन करने से मनुष्य के  सारे दुखों का अंत होता है और वो शत्रुंजय बन जाता है|

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माँ दुर्गा का छठा स्वरुप – कात्यायनी https://www.panditpurshotamgaur.com/maa-durga-ka-chhatha-swaroop/ Thu, 11 Apr 2019 10:03:45 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1143 चैत्र नवरात्री का महापर्व पूरे नौं दिन चलता है और ये नौं दिन माँ दुर्गा की भक्ति और नाम स्मरण में ही बीतते हैं| नवरात्री महापर्व का हर एक दिन देवी माँ के किसी न किसी रूप के मनन और पूजन का दिन होता है| आज नवरात्री का छठा दिन है और हम यहाँ जानेगें …

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चैत्र नवरात्री का महापर्व पूरे नौं दिन चलता है और ये नौं दिन माँ दुर्गा की भक्ति और नाम स्मरण में ही बीतते हैं| नवरात्री महापर्व का हर एक दिन देवी माँ के किसी न किसी रूप के मनन और पूजन का दिन होता है|

आज नवरात्री का छठा दिन है और हम यहाँ जानेगें की छठा दिन देवी माँ के कौनसे रूप को पूजा जाता है|

नवरात्री का छठा दिन माँ कात्यायनी को समर्पित है, माँ कात्यायनी को गौरी, हेमावती, भद्रकाली आदि नामों से भी जाना जाता है| माँ कात्यायनी की सवारी सिंह है, इनके चार हाथ है| माता का १ हाथ अभय मुद्रा, १ हाथ वरमुद्रा, १ हाथ में कमल का पुष्प और १ हाथ में तलवार है जो की दुष्टों का संहार करती है और सज्जनो को अभय वर देती है|

स्कन्द पुराण के अनुसार सृष्टि में महिषासुर नाम के राक्षस का आतंक बढ़ने पर ईश्वर के क्रोध से माँ कात्यायनी उत्पन हुईं और महिषासुर का वध कर सृष्टि में धर्म की पुनः स्थापना की|

पौराणिक कथाओं के अनुसार सभी देवों के तेज़ से उत्पन देवी का पूजन सबसे पहले महर्षि कात्यान ने किया था इसी वजह से इनका नाम कात्यायनी पड़ा|

चूँकि गोपियों ने श्रीकृष्ण को पाने के लिए माँ कात्यायनी का ध्यान ही किया था इसीलिए जिन अविवाहित कन्याओं के विवाह में अड़चने आ रही हो उन्हें माँ कात्यायनी का पूजन विशेष लाभ देता है, इससे  वैवाहिक जीवन में हो रही समस्याओं का निवारण भी होता है|

माँ का ध्यान विशेष रूप से गोधूलि वेला में करना चाहिए, ध्यान आज्ञा चक्र पर निर्धारण कर के माँ का स्मरण करने से जीवन के सभी संघर्षों में विजयश्री प्राप्त होती है और अंत में मोक्ष मिलता है|

नवरात्री षष्ठी अर्थात छठे दिन माँ कात्यायनी का पूजन निश्चित रूप से फलदायी है, इस दिन विभिन्न प्रकार के मिष्ठान और फ़लों का भोग लगा कर षोडशोपचार से माँ का पूजन करना चाहिए और विनती करनी चाहिए की जिस प्रकार महिषासुर का वध करके उन्होंने सृष्टि का उद्धार किया था वैसे ही आपके जीवन का भी उद्धार करें और परम गति प्रदान करें|

माँ कात्यायनी का मंत्र:

चन्द्रहासोज्ज्वलकरा शार्दूलवरवाहन ।
कात्यायनी शुभं दद्याद्देवी दानवघातिनी ॥


विवाह के लिए माँ कात्यायनी का मंत्र:

ॐ कात्यायनी महामाये महायोगिन्यधीश्वरि|
नंदगोपसुतम् देवि पतिम् मे कुरुते नम:॥


माँ कात्यायनी की आरती:

जय जय अम्बे जय कात्यानी
जय जगमाता जग की महारानी
बैजनाथ स्थान तुम्हारा
वहा वरदाती नाम पुकारा
कई नाम है कई धाम है
यह स्थान भी तो सुखधाम है
हर मंदिर में ज्योत तुम्हारी
कही योगेश्वरी महिमा न्यारी
हर जगह उत्सव होते रहते
हर मंदिर में भगत है कहते
कत्यानी रक्षक काया की
ग्रंथि काटे मोह माया की
झूठे मोह से छुडाने वाली
अपना नाम जपाने वाली
ब्रेह्स्पतिवार को पूजा करिए
ध्यान कात्यानी का धरिये
हर संकट को दूर करेगी
भंडारे भरपूर करेगी
जो भी माँ को ‘चमन’ पुकारे
कात्यानी सब कष्ट निवारे||



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माँ दुर्गा का पांचवा स्वरुप – स्कंदमाता https://www.panditpurshotamgaur.com/maa-durga-ka-panchwa-swaoop/ Wed, 10 Apr 2019 07:14:53 +0000 http://www.panditpurshotamgaur.com/?p=1132 जैसा की हम सब जानते है की चैत्र नवरात्री का महापर्व चल रहा है और ये नौं दिन पूर्ण रूप से माँ दुर्गा की भक्ति को समर्पित रहतें  है| नवरात्री का हर दिन देवी माँ के किसी न किसी स्वरुप को समर्पित है| आज नवरात्री का पांचवा दिन है और हम यहाँ जानेगें की पांचवा …

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जैसा की हम सब जानते है की चैत्र नवरात्री का महापर्व चल रहा है और ये नौं दिन पूर्ण रूप से माँ दुर्गा की भक्ति को समर्पित रहतें  है| नवरात्री का हर दिन देवी माँ के किसी न किसी स्वरुप को समर्पित है|

आज नवरात्री का पांचवा दिन है और हम यहाँ जानेगें की पांचवा दिन देवी माँ के कौनसे रूप को पूजा जाता है|

नवरात्री का  दिन पांचवा माँ स्कंदमाता को समर्पित है, स्कंदमाता बब्बर शेर पर विराजमान है और इनकी गोद में पुत्र स्कन्द यानी  कुमार कार्तिकेय बैठे है| इस मातृ रूप के कारण ही इनका नाम स्कंदमाता पड़ा| माँ स्कंदमाता के ४ हाथ है; २ हाथों में कमल के पुष्प है, १ हाथ वरमुद्रा में है और १ हाथ से स्कन्द कुमार को पकड़ रखा है| इनका १ स्वरुप कमल के फूल पर बैठे हुए भी है, इसी कारण माँ को पद्मासना के नाम से भी जाना जाता है|

स्कंदमाता अपने भक्तों को मोक्ष प्रदान करती है, इनकी भक्ति करने से जीवन में शांति और समृद्धि आती है| निःसंतान दम्पतियों के लिए भी स्कंदमाता का आशीर्वाद जीवन बदलने की क्षमता रखता है|

नवरात्री के पांचवें दिन देवी माँ को पीली मिठाई, केसर युक्त खीर और केले का भोग लगाने से सौभाग्य की प्राप्ति होती है, इस दिन सौभायवती स्त्रियों को माँ स्कंदमाता को चुनरी और सौभाग्य सामग्री अर्पित करनी चाहिए|

स्कंदमाता का मंत्र:

सिंहासनगता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी॥


स्कंदमाता की आरती:

जय तेरी हो अस्कंध माता
पांचवा नाम तुम्हारा आता
सब के मन की जानन हारी
जग जननी सब की महतारी
तेरी ज्योत जलाता रहू मै
हरदम तुम्हे ध्याता रहू मै
कई नामो से तुझे पुकारा
मुझे एक है तेरा सहारा
कही पहाड़ो पर है डेरा
कई शेहरो मै तेरा बसेरा
हर मंदिर मै तेरे नजारे
गुण गाये तेरे भगत प्यारे
भगति अपनी मुझे दिला दो
शक्ति मेरी बिगड़ी बना दो
इन्दर आदी देवता मिल सारे
करे पुकार तुम्हारे द्वारे
दुष्ट दत्य जब चढ़ कर आये
तुम ही खंडा हाथ उठाये
दासो को सदा बचाने आई
‘भक्त’ की आस पुजाने आई

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